
लमती का कत्लेआम: जंगल को निगल गया ढोंगी बाबा, बालोद के अफसर और हुकूमत खामोश तमाशाई बालोद, 19 जून 2026 डौंडी लोहारा का सीना चीरकर बना लमती कक्ष नंबर 304 अब जंगल नहीं, ‘कब्रगाह’ है। हुकूमत के कागज़ों में ये ‘महफूज़ जंगल’ है, मगर ज़मीन पर सिर्फ ठूंठ, कब्ज़ा और कुल्हाड़ी की गूंज है। और इस गुनाह का मुजरिम सिर्फ एक नहीं — ढोंगी बालकदास, बालोद का वन महकमा, जिला इंतज़ामिया और छत्तीसगढ़ की पूरी हुकूमत, सब बराबर के शरीक हैं।
1. लमती 304: जंगल नहीं, अब जल्लादों का अड्डा लमती को ‘महफूज़’ लिखा गया, मगर 5 बरस से यहां कानून नहीं, बालकदास की ‘हुकूमत’ चलती है। • कत्लेआम: सागौन-साल के सैकड़ों दरख़्त रातों-रात गायब। हर ठूंठ चीखकर कह रहा है — ‘इंसाफ करो’। • नाजायज़ कब्ज़ा: महफूज़ ज़मीन पर झोपड़ी, दीवार, पक्की तामीर। जंगल की छाती पर खंजर। • महकमा बेखबर: जंगलात कानून 1927 और जंगल हिफाज़त कानून 1980 चीख-चीखकर कहता है — एक टहनी तोड़ना भी जुर्म है। फिर बाबा के लिए कौन सी शरियत चल रही है?
2. बाबा नहीं, निज़ाम का दामाद है क्या? गांव का बच्चा-बच्चा पूछ रहा है: “गरीब सूखी लकड़ी उठाए तो सीधा जेल, और बाबा पूरा जंगल हड़प ले तो अफसर सलाम ठोकें?” • वन महकमा बालोद: बीट गार्ड से DFO तक सब खामोश। गश्त के नाम पर सिर्फ कागज़ी घोड़े। • जिला इंतज़ामिया: कब्ज़ा हटाने का नोटिस तो दूर, उल्टा बाबा के दर पर माथा टेका जाता है। • हुकूमत की गफलत: ‘नरवा-गरुवा’ का नारा देने वाली सरकार के नाक के नीचे जंगल ‘बेनरवा’ हो गया। यही है तरक्की का पैमाना?
3. किताब में कहीं नहीं लिखा कि कार्रवाई हराम है कानून की कोई दफा ये नहीं कहती कि ‘चोला’ पहन लो और जंगल उजाड़ दो। फिर गिरफ्तारी क्यों नहीं?
1. सियासी साया: वोट और नोट के लिए जंगल की कुर्बानी।
2. अफसरों की साज़िश: ‘ऊपर तक हफ्ता जाता है’ — ये बात अब दीवारों पर लिखी है।
3. खौफ का माहौल: जो आवाज़ उठाए, उसे झूठे मुकदमे की धमकी। साफ इल्ज़ाम: जब आईन सबके लिए एक है, तो बालकदास पर जंगलात कानून की दफा 33, ताज़ीरात-ए-हिंद 441, और पेसा कानून के तहत हथकड़ी क्यों नहीं?
4. अब सब्र टूटा —
3 मुतालबे, वरना अंजाम बुरा होगा
1. बालकदास को फौरन गिरफ्तार करो और पूरे गैंग पर गैंगस्टर एक्ट।
2. लमती कांड की CBI या हाईकोर्ट जज से तहकीकात: किस अफसर ने कितनी रिश्वत खाई, हिसाब दो।
3. बालोद DFO और डौंडी लोहारा रेंजर को फौरन मुअत्तल करो और मिसाल बनाओ। जंगल सिर्फ दरख़्त नहीं, बस्तर से सरगुजा तक आदिवासी की रूह है। लमती का कत्ल करने वाले और कत्ल करवाने वाले — दोनों मुजरिम हैं। रायपुर की हुकूमत कान खोलकर सुन ले: जल्द ही बुलडोज़र बाबा के नाजायज़ कब्ज़े पर नहीं चला, और दलाल अफसर सलाखों के पीछे नहीं गए, तो अगला घेराव मंत्रालय का होगा। जंगल का खून बहाने वालों का हिसाब अब अवाम खुद करेगी।

