घरेलू उपभोक्ताओं पर नया झटका

देश की जनता को वर्षों से बताया जा रहा है कि देश बदल रहा है, अर्थव्यवस्था मजबूत हो रही है, दुनिया भारत का लोहा मान रही है और विकास की गाड़ी रॉकेट की गति से दौड़ रही है। लेकिन आम आदमी के घर में बैठा बिजली का मीटर शायद यह विकास नहीं समझ पा रहा है, क्योंकि उसकी सुई हर महीने जेब पर नया झटका देने में लगी हुई है।अब एक जुलाई से बिजली की दरों में बढ़ोतरी होने जा रही है।

खबरों के अनुसार घरेलू उपभोक्ताओं के लिए प्रति यूनिट 30 से 50 पैसे और गैर घरेलू व व्यावसायिक उपभोक्ताओं के लिए 20 से 40 पैसे तक की बढ़ोतरी लागू होगी। कंपनियों ने 24 प्रतिशत वृद्धि मांगी थी, आयोग ने 6.23 प्रतिशत की मंजूरी दे दी। यानी जनता की जेब काटने का प्रस्ताव थोड़ा छोटा जरूर हुआ, लेकिन कैंची चलनी बंद नहीं हुई।कमाल की बात यह है कि जनता को हर बार यह समझाने की कोशिश की जाती है कि यह सब उसके हित में है।

शायद इसी को नया अर्थशास्त्र कहते हैं, जिसमें महंगाई को सुविधा और जेब पर बोझ को विकास का प्रमाणपत्र घोषित कर दिया जाता है।डीजल-पेट्रोल के दाम कौन संभाल रहे हैं, यह देश जानता है। रसोई गैस के बढ़ते दामों का दर्द भी हर घर महसूस कर चुका है। अब बिजली का बिल संभालने की जिम्मेदारी राज्य सरकारों के कंधों पर है। ऐसे में जनता के लिए मानो एक नई व्यवस्था तैयार हो चुकी है

डीजल, पेट्रोल और गैस मोदी जी संभाल रहे हैं। बिजली बिल विष्णुदेव जी संभाल रहे हैं।इन महामानवों का हौसला कभी टूटने मत देना,करंट सहते रहना…!कभी पेट्रोल महंगा होता है तो कहा जाता है कि अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां जिम्मेदार हैं। गैस सिलेंडर महंगा होता है तो कहा जाता है कि वैश्विक बाजार का असर है। बिजली महंगी होती है तो बताया जाता है कि व्यवस्था को चलाने के लिए यह आवश्यक है।

सवाल यह है कि आखिर ऐसा कौन सा क्षेत्र बचा है, जहां आम आदमी को राहत मिली हो?जिस देश में बेरोजगार युवक नौकरी की तलाश में दर-दर भटक रहा हो, किसान लागत और मौसम दोनों से जूझ रहा हो, मध्यम वर्ग ईएमआई और टैक्स के बोझ तले दबा हो और गरीब आदमी दो वक्त की रोटी के लिए संघर्ष कर रहा हो, वहां लगातार बढ़ती महंगाई किसी आर्थिक नीति की सफलता नहीं, बल्कि जनता की सहनशक्ति की परीक्षा बन चुकी है।

सबसे दिलचस्प दृश्य यह है कि कुछ टीवी स्टूडियो और तथाकथित गोदी मीडिया आज भी जनता के असली मुद्दों की जगह पाकिस्तान, मंदिर-मस्जिद, विपक्ष की छींक और सोशल मीडिया के शोर में व्यस्त हैं। बिजली का बढ़ा हुआ बिल, रसोई गैस का बढ़ता बोझ, डीजल-पेट्रोल की कीमतें और महंगाई से टूटता मध्यम वर्ग उनकी बहसों के केंद्र में शायद ही कभी दिखाई देता है।लोकतंत्र में सरकारें जनता के लिए होती हैं, जनता सरकारों के लिए नहीं। इसलिए सवाल पूछना अपराध नहीं, बल्कि नागरिक का अधिकार है।

आखिर विकास का मतलब केवल भाषणों, विज्ञापनों और होर्डिंगों में दिखाई देने वाली चमक है या फिर आम आदमी की जेब में बचने वाला पैसा भी उसका हिस्सा है?क्योंकि जनता अब यह पूछने लगी है कि—यदि हर महीने महंगाई का नया करंट ही मिलना है,तो फिर आखिर “अच्छे दिन” किस मीटर में दर्ज हो रहे हैं?”करंट जनता सह रही है, लेकिन तालियां बजाने का ठेका गोदी मीडिया ने ले रखा है।”

  • Related Posts

    PM Modi Rajasthan Gujarat Visit: ₹1.06 लाख करोड़

      प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का राजस्थान और गुजरात दौरा आज विकास, कनेक्टिविटी और औद्योगिक विस्तार के लिहाज से बड़ा माना जा रहा है। इस दौरे के दौरान राजस्थान के बालोतरा…

    बालोद में जंगल कटाई और अवैध कब्जे

    लमती का कत्लेआम: जंगल को निगल गया ढोंगी बाबा, बालोद के अफसर और हुकूमत खामोश तमाशाई बालोद, 19 जून 2026 डौंडी लोहारा का सीना चीरकर बना लमती कक्ष नंबर 304…

    Leave a Reply

    Your email address will not be published. Required fields are marked *