
आदिवासी आस्था पर पहरा या सत्ता का अहंकार? आखिर बालोद प्रशासन किसके इशारे पर चला रहा है डंडा?पेन-देव करसाड़ जतरा में जाने वालों को चेतावनी, वाहनों की जब्ती की चर्चा और कानूनी कार्रवाई की बातें… आखिर आदिवासी समाज का अपराध क्या है?✍️ गब्बर सिंह की चूभती हुई कलम सेबालोद। लोकतंत्र में सरकारें जनता से बनती हैं, जनता सरकार से नहीं। संविधान जनता को अधिकार देता है, प्रशासन उन अधिकारों की रक्षा करने के लिए बनाया जाता है। लेकिन जब वही प्रशासन किसी समाज की आस्था, परंपरा और सांस्कृतिक पहचान के सामने पुलिसिया पहरा खड़ा कर दे, तब सवाल केवल एक कार्यक्रम का नहीं रह जाता, बल्कि पूरे लोकतांत्रिक चरित्र का बन जाता है।बालोद जिले के तूएगोंदी में आगामी 20 जून 2026 को आयोजित होने वाली पेन/देव करसाड़ जतरा (जमहा पाट) को लेकर जिस तरह की प्रशासनिक सक्रियता दिखाई जा रही है, उसने आदिवासी समाज के भीतर गहरी नाराजगी और आशंका पैदा कर दी है। गांव-गांव तक संदेश पहुंच रहे हैं कि कार्यक्रम में जाने वालों पर निगरानी रखी जाएगी, वाहनों पर कार्रवाई हो सकती है और कानूनी कदम भी उठाए जा सकते हैं। यदि वास्तव में ऐसा हो रहा है, तो सबसे पहले प्रशासन को जनता के सामने स्पष्ट जवाब देना चाहिए कि आखिर आदिवासी समाज का कसूर क्या है?क्या अपने पुरखों को याद करना अपराध है?क्या पेन-देवों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करना कानून के खिलाफ है?क्या अपनी संस्कृति और परंपरा को बचाने की कोशिश करना अब प्रशासन की नजर में संदिग्ध गतिविधि बन गई है?यदि नहीं, तो फिर यह भय का माहौल क्यों बनाया जा रहा है?सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस सर्व आदिवासी समाज ने 1 जून 2026 को कलेक्ट्रेट घेराव के दौरान छह सूत्रीय मांगों के साथ प्रशासन के सामने दस्तावेज और तथ्य रखे थे, उन मांगों का जवाब आज तक क्यों नहीं दिया गया?लोकतंत्र में सवाल पूछना अपराध नहीं होता।लेकिन जवाब न देना जरूर लोकतांत्रिक जिम्मेदारी से भागना माना जाता है।यदि समाज की मांगें गलत हैं, तो प्रशासन दस्तावेजों के साथ सार्वजनिक रूप से बताए कि वे गलत क्यों हैं।यदि मांगें सही हैं, तो कार्रवाई करे।लेकिन न जवाब देना, न कार्रवाई करना और दूसरी तरफ समाज के कार्यक्रमों को लेकर सख्ती का वातावरण बनाना—यह संदेह पैदा करता है कि कहीं प्रशासन निष्पक्ष मध्यस्थ की भूमिका छोड़कर किसी एक पक्ष का संरक्षक तो नहीं बन गया है।बालोद प्रशासन को यह भी बताना चाहिए कि आखिर एक सांस्कृतिक और धार्मिक आयोजन को लेकर इतनी बेचैनी क्यों है?क्या जिले में अवैध शराब पूरी तरह बंद हो गई?क्या रेत माफिया खत्म हो गए?क्या वन भूमि पर अतिक्रमण के सारे मामले निपट गए?क्या भ्रष्टाचार समाप्त हो गया?यदि नहीं, तो फिर पूरी प्रशासनिक ताकत एक पारंपरिक आदिवासी आयोजन पर ही क्यों केंद्रित दिखाई दे रही है?यह प्रश्न केवल आदिवासी समाज का नहीं, बल्कि लोकतंत्र में विश्वास रखने वाले हर नागरिक का है।विडंबना देखिए, देश में बड़े-बड़े धार्मिक आयोजनों के लिए प्रशासन सुरक्षा, यातायात और सुविधाओं की व्यवस्था करता है, लेकिन जब आदिवासी समाज अपने पुरखों, पेन शक्ति और प्रकृति शक्ति के सम्मान में एकत्रित होने की बात करता है, तो चर्चा सुविधाओं की नहीं बल्कि प्रतिबंधों और कार्रवाई की होने लगती है।क्या कानून का तराजू सभी के लिए बराबर है?या फिर कुछ लोगों के लिए कानून रुई बन जाता है और कुछ के लिए लोहे की छड़?बालोद प्रशासन को यह समझना होगा कि आदिवासी समाज कोई बाहरी शक्ति नहीं है। यही इस धरती के मूल निवासी हैं, जिन्होंने सदियों से जल, जंगल और जमीन की रक्षा की है। जिन जंगलों को बचाने के नाम पर आज करोड़ों रुपये की योजनाएं चल रही हैं, उन्हें बचाकर रखने का काम इन्हीं समुदायों ने पीढ़ियों तक किया है।आज यदि वही समाज अपनी आस्था और सांस्कृतिक अधिकारों को लेकर सवाल पूछ रहा है, तो उसका जवाब पुलिस की भाषा में नहीं, संवाद की भाषा में दिया जाना चाहिए।इतिहास गवाह है कि सत्ता की ताकत कभी स्थायी नहीं होती।कुर्सियां बदल जाती हैं।अधिकारी बदल जाते हैं।सरकारें बदल जाती हैं।लेकिन समाज की स्मृति और संघर्ष की कहानी पीढ़ियों तक जीवित रहती है।इसलिए बालोद प्रशासन के सामने आज भी अवसर है कि वह संवाद का रास्ता चुने, तथ्यों के साथ जवाब दे और जनता के बीच विश्वास कायम करे।क्योंकि लोकतंत्र में जनता को आदेश देकर चुप कराया जा सकता है, लेकिन जनता के मन से सवाल नहीं निकाले जा सकते।और आज आदिवासी समाज का सवाल बहुत सीधा है—”हम अपनी आस्था के साथ खड़े हैं, संविधान हमारे साथ है, फिर प्रशासन हमारे सामने क्यों खड़ा है?”यही सवाल बालोद की धरती से उठ रहा है और इसका जवाब प्रशासन को देना ही होगा।जवाब से भागकर नहीं, जवाब देकर।

