आस्था पर तो पाबंदियां हैं

क्या आदिवासी आस्था पर पहरा लोकतंत्र की जीत है या संविधान की हार?भारत केवल एक भूभाग नहीं है। भारत विविधताओं का महासागर है। यहां सैकड़ों भाषाएं, हजारों जातियां, अनेक धर्म, पंथ, समुदाय और सांस्कृतिक परंपराएं सदियों से साथ-साथ विकसित होती रही हैं। यही विविधता भारत की सबसे बड़ी शक्ति है और यही संविधान की आत्मा भी है।भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को अपनी संस्कृति, परंपरा, भाषा, रीति-रिवाज और धार्मिक आस्था को संरक्षित रखने तथा उसके अनुरूप जीवन जीने का अधिकार प्रदान करता है। यह अधिकार किसी सरकार की कृपा नहीं बल्कि संवैधानिक गारंटी है। इसलिए केवल नागरिकों की ही नहीं, बल्कि शासन-प्रशासन और राज्य व्यवस्था से जुड़े प्रत्येक अधिकारी की भी यह नैतिक एवं संवैधानिक जिम्मेदारी है कि वह सभी समुदायों के साथ समान व्यवहार करे।लेकिन बालोद जिले के तूएगोंदी क्षेत्र से जो खबरें सामने आ रही हैं, वे अनेक गंभीर सवाल खड़े करती हैं। यदि यह सत्य है कि आदिवासी समाज को अपनी पारंपरिक सामाजिक-धार्मिक आस्था से जुड़े कार्यक्रमों में शामिल होने से रोकने के लिए प्रशासनिक दबाव बनाया जा रहा है, वाहन मालिकों को कार्रवाई की चेतावनी दी जा रही है और ग्रामीणों को भयभीत किया जा रहा है, तो यह केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों की परीक्षा का विषय है।सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर ऐसा कौन-सा अपराध आदिवासी समाज कर रहा है, जिसके कारण उसे अपनी पारंपरिक सामाजिक और धार्मिक गतिविधियों के लिए प्रशासनिक अनुमति की आवश्यकता पड़ रही है? भारत के इतिहास में आदिवासी समाज को हमेशा प्रकृति का रक्षक, जल-जंगल-जमीन का संरक्षक और सांस्कृतिक विविधता का वाहक माना गया है। देश की स्वतंत्रता से लेकर आज तक आदिवासी समाज ने कभी ऐसी स्थिति उत्पन्न नहीं की कि उसकी सांस्कृतिक गतिविधियों को राष्ट्रीय सुरक्षा या कानून व्यवस्था के लिए खतरा माना जाए।विडंबना यह है कि जिस समाज ने सदियों तक जंगलों की रक्षा की, वही समाज आज अपने ही पारंपरिक स्थलों तक पहुंचने के लिए संघर्ष कर रहा है। दूसरी ओर जिन लोगों पर जंगलों और सामुदायिक आस्था स्थलों पर अतिक्रमण के आरोप लगते रहे हैं, उनके प्रति प्रशासन का रवैया अपेक्षाकृत नरम दिखाई देता है। यदि ऐसा है तो यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि कानून का डंडा केवल कमजोरों पर ही क्यों चलता है?छत्तीसगढ़ को आदिवासी संस्कृति और परंपराओं की धरती कहा जाता है। राज्य के मुख्यमंत्री स्वयं आदिवासी समाज से आते हैं। ऐसे में आदिवासी समुदाय की संवेदनाएं और भी अधिक महत्व रखती हैं। इसलिए सरकार का दायित्व केवल कानून-व्यवस्था बनाए रखना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि किसी भी समुदाय को अपनी सांस्कृतिक पहचान और पारंपरिक आस्था के संरक्षण के लिए संघर्ष न करना पड़े।आज आवश्यकता किसी टकराव की नहीं, बल्कि संवाद की है। आवश्यकता किसी दमनात्मक कार्रवाई की नहीं, बल्कि संवैधानिक समाधान की है। यदि प्रशासन के पास कोई वैध कानूनी कारण है तो उसे सार्वजनिक रूप से स्पष्ट करना चाहिए। और यदि आदिवासी समाज की आशंकाएं सही हैं तो उन्हें दूर करने की जिम्मेदारी भी शासन की ही है।लोकतंत्र की ताकत पुलिस बल की संख्या से नहीं मापी जाती। लोकतंत्र की असली ताकत उस विश्वास में होती है, जो जनता और शासन के बीच कायम रहता है। जब किसी समुदाय को यह महसूस होने लगे कि उसकी आवाज सुनी नहीं जा रही, तब लोकतंत्र कमजोर होने लगता है।सवाल केवल तूएगोंदी का नहीं है। सवाल यह है कि क्या भारत का संविधान सभी नागरिकों के लिए समान रूप से लागू होगा या फिर परिस्थितियों और प्रभावशाली लोगों के अनुसार उसकी व्याख्या की जाएगी?इतिहास गवाह है कि अधिकारों की रक्षा संवाद, न्याय और संवैधानिक मूल्यों से होती है, भय और प्रतिबंधों से नहीं। इस भी सनद रहे बालोद जिला प्रसासन और जिला प्रशासन के हवाले छत्तीसगढ़ सरकार को दिनांक 1 जून 2026 हुए कलेक्टर घेराव के दौरान सर्व आदिवासी समाज जिला बालोद में 6 सूत्री मांग के जरिए पूरा लिखित दस्तावेज जिला प्रशासन बालोद के समक्ष प्रस्तुत किया था जिसका आज तक कोई जवाब नहीं आया है जबकि शासन और प्रशासन को सर्व आदिवासी समाज के द्वारा उठाए गए 6 सूत्री सवालों पर ईमानदारी और नैतिकता पूर्ण तरीके से जवाब देना था ताकि समाज के लोग तूएगोंदी से जुड़े हुए मामले में जिला प्रशासन का क्या रुख है उसे समझ सके और उसके हिसाब से सरकार के समक्ष अपनी बात कर सके किंतु जिला प्रशासन बालोद के द्वारा लगातार एक संरक्षित समाज के प्रति दुर्भावना पूर्ण व्यवहार किया जा रहा है जो की आज नहीं तो कल इंसाफ की तगजा पर जरूर तोला जा सकता है।

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